
समकालीन यूरोपीय सिनेमा में बुढ़ापे और उम्र बढ़ने की छवियों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय फिल्म स्टडीज़ जर्नल Cinéma & Cie ने अपने आगामी विशेष अंक के लिए शोध निबंध (Call for Essays) आमंत्रित किए हैं। इस अंक का विषय है—“Ageing on Contemporary European Screens: Dialogues Between Film Studies and Cultural Gerontology.”
पिछले दो दशकों में फिल्मों और अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यमों में बुढ़ापे और वृद्धावस्था की प्रस्तुतियों पर अकादमिक रुचि तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती वैश्विक उम्रदराज़ आबादी और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों के कारण यह विषय आज सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यूरोप दुनिया का सबसे “उम्रदराज़” महाद्वीप बन चुका है। जनसांख्यिकीय आंकड़ों के मुताबिक 1950 से 2025 के बीच यूरोप की आबादी की औसत आयु में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आज यूरोप की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा 65 वर्ष से अधिक आयु का है। इसी सामाजिक बदलाव को ध्यान में रखते हुए यह विशेष अंक फिल्मों में उम्र और वृद्धावस्था की सांस्कृतिक व्याख्याओं को समझने का प्रयास करेगा।
इस अंक का उद्देश्य फिल्म स्टडीज़ और कल्चरल जेरोंटोलॉजी (Cultural Gerontology) के बीच संवाद स्थापित करना है। शोधकर्ता यह जांचेंगे कि यूरोपीय फिल्मों में उम्र, वृद्धावस्था और पीढ़ियों के रिश्तों को किस तरह दिखाया जाता है और ये प्रस्तुतियां समाज की सोच और पहचान को कैसे प्रभावित करती हैं।

जर्नल खास तौर पर 2010 के बाद रिलीज़ हुई यूरोपीय फिल्मों पर आधारित शोध को प्राथमिकता देगा। संभावित विषयों में वृद्धावस्था की सिनेमाई छवियां, जेंडर और उम्र का संबंध, यूरोपीय स्टार सिस्टम में ‘सिल्वरिंग’ यानी उम्रदराज़ सितारों की उपस्थिति, विभिन्न फिल्म शैलियों में वृद्ध पात्रों की भूमिका, और फिल्म उद्योग की नीतियों में उम्र से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
इच्छुक शोधकर्ताओं को 300 से 400 शब्दों का एब्स्ट्रैक्ट और संक्षिप्त बायो 18 मई 2026 तक भेजना होगा। चयनित लेखकों को नवंबर 2026 तक अपना पूरा शोध लेख जमा करना होगा, जिसकी अधिकतम सीमा 6000 शब्द निर्धारित की गई है। सभी लेख डबल-ब्लाइंड पीयर-रिव्यू प्रक्रिया से गुजरेंगे।
इस विशेष अंक का प्रकाशन जून 2027 में प्रस्तावित है। आयोजकों का मानना है कि यह पहल न केवल फिल्म अध्ययन बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक शोध में भी उम्र और पहचान के नए आयाम खोलने में मदद करेगी।
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