रुद्रपुर के राजकीय पी.जी. कॉलेज के शोध छात्र ने पीएचडी शोध में बताया जलवायु परिवर्तन से नैनीताल के बलिया जलग्रहण क्षेत्र में जल संसाधन पर गंभीर खतरा

सरदार भगत सिंह राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रुद्रपुर के भूगोल विभाग में डॉ.पूनम शाह गंगोला के निर्देशन में शोधकार्य कर रहे वसीम अहमद को कुमायूँ विश्वविद्यालय ने शोध उपाधि प्रदान की है। वसीम अहमद की शोध उपाधि मौखिकी के बाह्य परीक्षक प्रोफेसर प्रवीन कुमार पाठक, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने वसीम अहमद के शोध को महत्वपूर्ण और प्रासंगिक बताते हुए कहा कि आज जल संसाधन को बचाने की नितांत आवश्यकता है। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो.अवधेश नारायण सिंह , भूगोल विभाग के शिक्षकों ने वसीम अहमद को पीएचडी उपाधि मिलने पर बधाई दी है।
डॉ पूनम शाह गंगोला के निर्देशन में ” इंपैक्ट ऑफ क्लाइमेट चेंज ऑन वाटर रिसोर्सेस: ए केस स्टडी ऑफ बलिया कैचमेंट डिस्ट्रिक्ट नैनीताल, उत्तराखंड” विषय पर प्रस्तुत शोध प्रबंध में वसीम अहमद ने यह बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में स्थित प्राकृतिक जल स्रोत ( धारे – नौले) व नदियों का अस्तित्व खतरे में है। पिछले चार -पांच दशकों में बलिया नदी (बलिया नाला) जलग्रहण क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के स्थानीय जल संसाधन पर नकारात्मक प्रभाव दिखाई पड़ रहे है। जल स्रोत धारे नौले सूख रहे हैं तथा बलिया नदी और उसकी मुख्य सहायक नदियां कुरियागाड एवं नलेनागाड में जलस्तर घट रहा है। आर्द्रभूमियों, जिन्हें स्थानीय रूप से सिमार एवं गजार कहा जाता है- सिकुड़ रही हैं । क्षेत्र में लगभग 19%जल स्रोत सूख चुके हैं तथा 24% मौसमी हो चुके हैं । अध्ययन में पाया गया है कि तापमान बढ़ रहा है, वर्षा का प्रतिरूप बदल रहा है, अधिकतर वर्षा अतिवृष्टि के रूप में हो रही है तथा वर्षा के दिन घट रहे है, चरम मौसमी घटनाएं बढ़ रही है , जिससे लोगों की सामाजिक आर्थिक स्थिति और खाद्य सुरक्षा संकट की स्थिति में है। जल संसाधन पर बढ़ते प्रभाव से कृषि, बागवानी व पशुपालन कम हुआ है।
वसीम अहमद ने अपने अध्ययन के निष्कर्ष में इस बात पर जोर दिया है कि यदि समय से जल संसाधन प्रबंधन नही किया गया तो क्षेत्र में समस्याएं बढ़ जाएंगी। अतः एक समुदाय आधारित जल संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्यकता है, जिसमें परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर जल स्रोत को पुनर्जीवित करने व रिचार्ज जोनों को चिन्हित कर उनका संरक्षण तथा जलवायु अनुकूलन पर भी ध्यान दिया जाय।


